चेतना पर पड़ा ‘अहंकार का पर्दा’ कैसे हटाएँ? बाबा के अनुसार सहज मार्ग क्या है?

संत श्री साहेब बाबा के दर्शन का मूल सार यह है कि परम ब्रह्म चेतना या ईश्वर की कृपा हम पर हर क्षण बरस रही है। ठीक वैसे ही जैसे सूर्य का प्रकाश निरंतर पृथ्वी पर पड़ता है। लेकिन, यदि हम अपनी खिड़कियाँ बंद रखें, तो हमें प्रकाश नहीं मिलेगा।

बाबा के अनुसार, हमारी आत्मा (चेतना) उस प्रकाश को अनुभव क्यों नहीं कर पाती? क्योंकि हमारी चेतना और उस परम सत्य के बीच एक सूक्ष्म, अदृश्य आवरण पड़ा है—वह है ‘अहंकार का पर्दा’


१. ‘अहंकार का पर्दा’ क्या है और क्यों पड़ता है?

‘पर्दा’ अहंकार, द्वेष, स्वार्थ, और ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ की भावना से बना है। यह पर्दा सत्य को देखने से रोकता है और हमें भ्रम (माया) की दुनिया में उलझाए रखता है।

अहंकार का कारणआध्यात्मिक अवरोध
द्वैत भावनायह मानना कि ‘मैं’ और ‘ईश्वर’ अलग हैं।
कामना (इच्छाएँ)कर्मों का फल पाने की इच्छा, जो बंधन उत्पन्न करती है।
अज्ञानतास्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को न पहचानना।

बाबा समझाते हैं कि: “पर्दा हटाने की क्षमता सूरज के पास ना कभी थी, ना कभी है, ना कभी होगी। इस अवरोध को हटाना हमारा और आपका काम है।” अर्थात्, परमात्मा निष्क्रिय है; सक्रियता हमें स्वयं लानी होगी।


२. साहेब बाबा के अनुसार अहंकार हटाने का सहज मार्ग (The Easy Path)

बाबा ने इस पर्दे को हटाने के लिए किसी जटिल कर्मकांड या हठ योग का सुझाव नहीं दिया, बल्कि ज्ञान, कर्म और उपासना का सहज और व्यावहारिक मार्ग बताया।

अ. सहज मार्ग सूत्र १: शुद्ध कर्म (निस्वार्थ सेवा)

अहंकार का पोषण ‘मैं कर रहा हूँ’ की भावना से होता है। शुद्ध कर्म इस भावना को मिटाने का सबसे शक्तिशाली साधन है।

  • संतसेवा को अपनाना: बाबा धाम का मुख्य एजेंडा संतसेवा है। संतसेवा अहंकार को तुरंत गलाती है, क्योंकि यह सिखाती है कि आप किसी परिणाम की आशा के बिना केवल सेवा कर रहे हैं।
  • बाँटने का गुण: उन्होंने ‘बाँटने के दिव्य गुण’ पर ज़ोर दिया। जब हम बिना किसी स्वार्थ के ज्ञान, प्रेम या सहायता बाँटते हैं, तो हमारा ‘मैं’ छोटा होने लगता है और हमारी चेतना खुलती है।
  • मीठी वाणी: अपने व्यवहार में विनम्रता और मधुरता लाना। विनम्रता अहंकार को सबसे पहले नष्ट करती है।

ब. सहज मार्ग सूत्र २: सही ज्ञान की पहचान

ज्ञान का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ना नहीं, बल्कि सत्य और असत्य के बीच भेद करना है।

  • आत्मज्ञान पर ध्यान: यह जानना कि हम शरीर नहीं, अखंड आत्मा हैं। यह ज्ञान ही ‘मैं’ (शरीर और मन) के भ्रम को काटता है।
  • शब्द ब्रह्म से तारतम्यता: साधना के माध्यम से सृष्टि के उद्गम शब्द ब्रह्म से जुड़ने का प्रयास करना। यह वह ज्ञान है जो सीधे परमसत्ता से जुड़ता है।

स. सहज मार्ग सूत्र ३: उपासना और समर्पण

पर्दे को हटाने के लिए निरंतर ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उपासना से मिलती है।

  • नियमित ध्यान (Meditation): नियमित रूप से परमसत्ता के निकट बैठने का अभ्यास करें। यह अभ्यास अहंकार के विचारों को शांत करता है और चेतना को एकाग्र करता है।
  • समर्पण: बाबा की छवि को हृदय में धारण करना और यह मानना कि ‘मैं नहीं, वह (परम सत्ता) ही सब कुछ कर रहा है’। पूर्ण समर्पण की भावना से ही अहंकार की पकड़ ढीली होती है।

३. निष्कर्ष: पर्दा हटाना और ब्रह्म चेतना की प्राप्ति

श्री साहेब बाबा का सहज मार्ग हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक प्रगति कोई जटिल रहस्य नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में किए गए छोटे-छोटे शुद्ध कर्मों और निरंतर स्मरण का परिणाम है।

जब हम निस्वार्थ कर्म और विनम्र उपासना को अपनाते हैं, तो अहंकार का पर्दा धीरे-धीरे पतला होता जाता है। और एक दिन, हमारी शुद्ध चेतना उस परम ब्रह्म जगत चेतना के साथ एकाकार हो जाती है, जिसे साहेब बाबा ने स्वयं प्राप्त किया था।

यह धाम हमें उसी सहज मार्ग पर चलने और अपने ‘पर्दे’ को हटाने की प्रेरणा देता है।