संत सेवा की महिमा
संत अपने जीवन को अग्नि में तपा कर जीव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं तथा अपना सर्वश्व त्याग कर जीव को परमात्मा को पाने का मार्ग दिखाते हैं। जीव के जीवन का कल्याण संतो के सानिध्य में ही होता है। संत एक जागृत ईश्वर हैं, जो जीव के भीतर सुप्त ईश्वर को जगा देते हैं।
दया तथा गहन अंतर्दृष्टि द्वारा एक सद्गुरु शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रूप से अभावग्रस्त जीवो में ईश्वर को दुःख भोगते हुए देखता है और इसीलिए उनकी सहायता करना वह अपना आनंददायक धर्म मानता है। वह दरिद्रो के रूप में भूखे भगवान को भोजन देना, अज्ञानियों के रूप में निद्राग्रस्त ईश्वर को जगाना, शत्रुओं के रूप में अचेतन ईश्वर को प्रेम करना तथा जिज्ञासु साधक के रूप में अर्ध – सुषुप्त ईश्वर को जगाने की चेष्ठा करता है। और विकसित साधको के रूप में लगभग पूर्ण जागृत ईश्वर को प्रेम के मृदु स्पर्श से वह तत्काल जगा देता है। सन्त ही, सभी जीवो में सर्वोत्तम दाता है। ईश्वर के समान ही उनकी उदारता की भी कोई सीमा नहीं ।
संत शब्द का अर्थ ही है सज्जन और धार्मिक जीव ।। संत वैररहित तथा निष्काम भाव से ईश्वर के प्रेमी और विषयों से विरक्त होते हैं। संतों की छाया भी जीस जीव पर पड़ जाती है उस जीव का कल्याण हो जाता है। संत परोपकार करने वाले होते हैं। संत संपूर्ण मानवता के लिए समर्पित होकर सभी जीवों के कल्याण का मार्ग वरण करते हैं। संत ईश्वर के एक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं उनका पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित होता है।
सतयुग,त्रेता,द्वापर में संतो की कृपा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था तभी तो यह उल्लेख मिलता है।
“संत कृपा भगवंत कृपा”
संतो की वाणी से अमृत की धार बरसती है जो भी जीव इस अमृत को ग्रहण कर लेता है तथा संत के वचन में दृढ़ विश्वास रखता है वह जीव दैहिक दैविक भौतिक तापो से छुटकारा पा लेता है। संत की करुणा, कृपा, दया दृष्टि से जीव के समस्त दुःखो का नास हो जाता है।
संतो की कृपा और सानिध्य से जीव का जीवन रूपांतरित होता है, संतों के बताए मार्ग पर चलकर जीव सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रो में सफलता प्राप्त कर लेता है। क्योकि संत तो संतुलित होते हैं ना तो उन्हें दुःख से पीड़ा होती है और ना ही वे सांसारिक सुखो से प्रसन्न होते हैं। वे सम्मान और अपमान जैसे द्वंदो से मुक्त होकर जीव को आनंदित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
संत ही सद्गुरु के रूप में जीव को परमात्मा से मिलने की प्यास जगा कर उसे पाने का मार्ग बताते हैं । जीस जीव के जीवन में संतो का सानिध्य है वही जीवन के सार्थकता को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि संत ही आपको इस संसार की निरर्थक उलझनो से बचाते हैं!!
संत हृदय नवनीत समाना lकह कबिन्ह परि कहै न जाना ll
निज परिताप द्रवइ नवनीता lपर दुःख द्रवहिं संत सुपनीताll
संतो की महिमा को केवल दुःख निवारण की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए बल्कि आत्म कल्याण के लिए लेना चाहिए फिर सुमिरन से सर्व सुख अकस्मात मिल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
संतो के सानिध्य और संत सेवा के फल से ही पूर्व जन्म में दासी पुत्र से नारद जी को महर्षि नारद बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआा नवधा भक्ति में भी “प्रथम भगति संतन्ह कर संगा” अर्थात् संतो का संग, सेवा, उनके सानिध्य का ही महत्व बताया गया है ईश्वर की प्राप्ती के लिए।
संता को प्रसाद आदकण आनंदकारी
रोग शोग भय हरे भृत को करे सुकारी
सुर सुरपती के आस भाग्य जो नरतन पावे
वेद करे बखान जास गुण गिनत न आवे
ता प्रसाद नारद भयो हरि को निज हित जान
और रामचरण भागवत में क्यो कृष्ण द्वेपान ।
साहेब बाबा धाम के दिव्य धरा पर आने वाले भगवत स्वरूप सभी साधु संतों सज्जनों का सम्मान पूर्वक अभिनंदन किया जाता है तथा उनको जल,भोजन,औषधि,वस्त्र,धन, एवं विश्राम करने की सुविधा इत्यादि जरूरत की सभी वस्तुएं भेंट दी जाती हैं जिससे कि उनकी भौतिक ज़रूरतें पूरी हो सके और उन्हें भगवत भक्ति करने में कोई बाधा उत्पन्न ना हो इस उद्देश्य के साथ साहेब बाबा धाम के द्वारा समस्त साधु संतों की सेवा प्रति दिन की जाती है!!





